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स्वामी विवेकानंद की ’प्रेमयोग’ पुस्तक भक्ति और प्रेम के आध्यात्मिक पथ पर एक उज्ज्वल प्रकाश डालती है। इस ग्रन्थ में स्वामीजी प्रेम और भक्ति के गहरे अंतरसंबंधों को बड़ी स्पष्टता से व्यक्त करते हैं। यह पुस्तक इस सत्य को उजागर करती है कि ईश्वर के प्रति सच्चा प्रेम ही भक्ति का सार है। यह प्रेम सांसारिक बंधनों और इच्छाओं से परे एक निर्मल और निःस्वार्थ भावना है। ’प्रेमयोग’ जीवन में प्रेम के अद्वितीय महत्व पर बल देता है। यह सिखाता है कि प्रेम जीवन की सबसे शक्तिशाली ऊर्जा है, और जब यही प्रेम परमात्मा के प्रति प्रवाहित होता है, तो वह भक्ति का रूप ले लेता है। इस पुस्तक में प्रेमी, प्रेम और प्रेम के पात्र ख्र अर्थात भक्त, भक्ति और भगवान की एकता पर विशेष जोर दिया गया है, जो प्रेम के आध्यात्मिक अनुभव की गहराई को दर्शाता है