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’पापा के जाने के बाद’ वसंतदेव जी को और-और जानने की एक सतत जिज्ञासा पाठकों के मन में पैदा कर दे, तो मैं अपने प्रयत्न को सफल समझेंगा।हाँ, अंत में एक बात और !उपन्यास लिखते समय इसका जो ’मैं’ है, वह कब, कैसे, ’श्रीमान् चंदूलाल चंदानी’ में बदल गया, यह मैं बिल्कुल नहीं जानता।हो सकता है, यह लेखक के ’कायाकल्प’ जैसा कोई चक्कर हो, जिसके बारे में लोग बक-झक बहुत करते हैं, जानते बहुत कम हैं।... या शायद यह मेरे भीतर बरसों से जड़ जमाए हुए, कोई बेशर्म किस्म का ’भूत’ है, जो पिंड छोड़ता ही नहीं, और जब देखो, तब अँधेरे बियाबानों से आकर सिर पर सवार हो जाता है!मगर है, तो है! इसका क्या कीजै !!तो पाठकवृंद, उपन्यास पढ़ते वक्त मेरी खाल में खामखा घुसे चले आए इन चंदूलाल चंदानी को भी जरा झेलिए!... (पिलीज!!)