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मुझे लगता है कि अतीत के सभी अवतार और तीर्थकर, पैगम्बर और मसीहे, चाहे कृष्ण हों या महावीर, बुद्ध हों या लाओत्से, क्राइस्ट हों या मोहम्मद सम्मिलित होकर इस बार ओशो के रूप में अवतरित हुए हैं। इसलिए ओशो किसी एक सम्प्रदाय, जाति या राष्ट्र के नहीं, वरन् पहली बार पूरी मनुष्य-जाति के लिए आए हैं।स्वामी अगेह भारती भाग्यवान हैं कि अपनी युवावस्था में ही ओशो के सम्पर्क में आये और खूब ही आये। बहुत नजदीक से उनके विभिन्न रूपों और मुद्राओं-उनकी लीलाओं को देखने का अमूल्य अवसर उन्हें मिला। और संवेदनशील हृदय के साथ-साथ उसे अभिव्यक्ति देने योग्य कलाकार की पैनी दृष्टि भी अगेह जी को मिली है। सोने में सुगन्ध की तरह उनकी लेखनी बहुत जीवन्त है।