Librería Samer Atenea
Kálamo Books
Librería Elías (Asturias)
Librería Kolima (Madrid)
Librería Proteo (Málaga)
बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में कदम रखते जान पड़ता है, कनैला अब पिछड़े इलाके का गाँव नहीं रह जाएगा। आजमगढ़ से एक नई पक्की सड़क कनैला तक पहुँच गई है जो सिसवा (शिंशपापुरी) में मैंगई के पुल को पार कर आगे तक जा रही है। कनैला में रिक्शा आने लगा है और लारी भी। हो सकता है, कुछ ही वर्षों में वहाँ से बस में बैठकर चार-छह घंटे में वाराणसी पहुँचा जा सके। इसे देखकर सिसवा के पुराने भाग्य के लौटने की कल्पना मन में उठने लगती है। पर, यह दूर की बात है। डीहा में हाई स्कूल चल रहा है। जहाँ इस शताब्दी के आरम्भ में स्कूल का भी पता नहीं था। यदि कनैला वालों ने अदूरदर्शिता का परिचय न दिया होता, तो वह हाई स्कूल कनैला में वहीं बनने जा रहा था जहाँ से कि हाल में पक्की सड़क निकली है। दो-चार एकड़ परती जमीन दे देने में कनैला वालों को बहुत नुकसान भी नहीं उठाना पड़ता। डीहा होकर एक दूसरी सड़क पश्चिम से पूर्व की ओर नप गई है। इस प्रकार यातायात के साधन सभी वहाँ मौजूद हो रहे हैं। तो भी अभी कनैला की ऊख के किसी मिल में जाने का सुभीता नहीं है। लोग अपनी जरूरत के गुड़ और खाँड़ के लिए ऊख बोते हैं जिसमें कुछ गुड़ बिक भी जाता है। रामचन्दर पण्डित ने ऊख बोने के लिए अपने खेत में पानी दिया। बोई जाने वाली ऊख को काटकर रात भर पानी में भिगो दिया। सबेरे ऊख बोने का समय आया। हलवाहे को बुलाने गये। उसने आने से इन्कार कर दिया।