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महापंडित राहुल सांकृत्यायन द्वारा रचित ’भागो नहीं दुनिया को बदलो’ एक अत्यंत प्रेरणादायक और वैचारिक कृति है। यह पुस्तक केवल एक साहित्यिक रचना नहीं, बल्कि समाज को देखने और उसे बेहतर बनाने का एक प्रगतिशील दृष्टिकोण है। जैसा कि शीर्षक से ही स्पष्ट है, लेखक पलायनवाद (भागने की प्रवृत्ति) के विरुद्ध हैं और सक्रिय परिवर्तन के पक्षधर हैं।मुख्य विषय और दर्शनः इस पुस्तक में राहुल सांकृत्यायन ने धर्म, समाज, राजनीति और अर्थतंत्र का गहन विश्लेषण किया है। उनका मानना है कि दुनिया में व्याप्त दुख और विषमता का कारण कोई दैवीय विधान नहीं, बल्कि गलत सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था है। वे युवाओं का आह्वान करते हैं कि वे समस्याओं से डरकर संन्यास या आध्यात्म की शरण में भागने के बजाय, तर्क और विज्ञान का सहारा लेकर इस दुनिया को बदलने का प्रयास करें।1. तर्कशीलताः राहुल जी ने रूढ़ियों और अंधविश्वासों पर तीखे प्रहार किए हैं। वे हर बात को ’तर्क’ की कसौटी पर कसने की सलाह देते हैं।2. साम्यवादी विचारधाराः पुस्तक पर मार्क्सवादी विचारधारा का गहरा प्रभाव है, जहाँ वे वर्गविहीन समाज और समानता की बात करते हैं।3. युवाओं को संदेशः यह पुस्तक विशेष रूप से युवा पीढ़ी को मानसिक दासता से मुक्त होकर स्वतंत्र चिंतन करने के लिए प्रेरित करती है।’भागो नहीं दुनिया को बदलो’ एक ऐसी मशाल है जो पाठक के भीतर सोई हुई चेतना को जगाती है। यह सिखाती है कि यदि हमें वर्तमान परिस्थितियाँ स्वीकार्य नहीं हैं, तो उन्हें कोसने के बजाय साहस के साथ उन्हें बदलने की जिम्मेदारी हमारी है। राहुल सांकृत्यायन की सीधी और सपाट बयानी इस पुस्तक को हर उस व्यक्ति के लिए पठनीय बनाती है जो समाज में बदलाव लाने का सपना देखता है।