LIBROS DEL AUTOR: rahul sankrityayan

22 resultados para LIBROS DEL AUTOR: rahul sankrityayan

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  • Kinner Desh Mein
    Rahul Sankrityayan
    ''किन्नर देश में'' राहुल सांकृत्यायन का एक प्रसिद्ध यात्रा-वृत्तांत है, जिसमें उन्होंने तिब्बत और नेपाल के किन्नर (हिजड़ा) समाज के बारे में विस्तार से लिखा है। यह पुस्तक लेखक के गहरे सामाजिक अवलोकन, मानवता, और संस्कृति के प्रति उनकी संवेदनशीलता को उजागर करती है।राहुल सांकृत्यायन ने इस यात्रा के दौरान किन्नर समाज की रहन-सहन, रीति-रिवाजों और उनकी सामाजिक स्थिति पर विचार किया। वह ...
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    23,92 €

  • Kanela Ki Katha (कनैला की कथा)
    Rahul Sankrityayan
    कनैला वस्तुत राहुल जी का पितृग्राम है और कनैला की कथा उसका ऐतिहासिक भौगोलिक चित्रफलक है । ईसापूर्व १३ वी शताब्दी में कनैला की स्थिति के बारे में एकदम सन्नाटा है उस जगह पर क्या कुछ था, कहा नही जा सकता। बाद के युग में शिशपा या सिसवा नगर की चर्चा की गई है। जिस समय (ईसापूर्व सातवी सदी) की हम बात कर रहे है, उस समय की भी धरोहर सिसवा और कनैला की भूमि में जरूर छिपी हुई है । वह सामने आत...
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    13,30 €

  • दिमागी गुलामी | Dimagi Gulami
    Rahul Sankrityayan
    ’जिस जाति की सभ्यता जितनी पुरानी होती है, उसकी मानसिक दासता के बन्धन भी उतने ही अधिक होते हैं। भारत की सभ्यता पुरानी है, इसमें तो शक ही नहीं और इसलिए इसके आगे बढ़ने के रास्ते में रुकावटें भी अधिक हैं। मानसिक दासता प्रगति में सबसे अधिक बाधक होती है।’ राहुल सांकृत्यायन की पुस्तक ’ दिमाग़ी गुलामी’ का यह शुरुआती अंश है।यह जैसे-जैसे आगे बढ़ता है, वह मनुष्य के भ्रम की शल्यचिकित्सा करत...
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    13,09 €

  • Kanaila ki katha
    Rahul Sankrityayan
    बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में कदम रखते जान पड़ता है, कनैला अब पिछड़े इलाके का गाँव नहीं रह जाएगा। आजमगढ़ से एक नई पक्की सड़क कनैला तक पहुँच गई है जो सिसवा (शिंशपापुरी) में मैंगई के पुल को पार कर आगे तक जा रही है। कनैला में रिक्शा आने लगा है और लारी भी। हो सकता है, कुछ ही वर्षों में वहाँ से बस में बैठकर चार-छह घंटे में वाराणसी पहुँचा जा सके। इसे देखकर सिसवा के पुराने भाग्य के लौ...
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    13,32 €

  • Anath
    Rahul Sankrityayan
    कुछ क्षण बाद मुँह का स्वाद फिर पहले जैसा हुआ, लेकिन भूख अँतड़ियों को काटने लगी। उसने लकड़ी लेकर जमीन को खोदा और मिट्टी के नीचे से पतली जड़ निकाल कर चबाना शुरू किया, पर यह भी कड़वी और दुःस्वादु थी, तो भी चबाते वक्त उससे रस निकला, जिसके भीतर जाने से अनाथ का चित्त कुछ तुष्ट हुआ। वह आँखों को दबाकर चेहरे पर सिकुड़न डाले हुए चबाई हुई जड़ को जोर लगाकर निगल गया। मन खराब नहीं हुआ और जड़...
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    13,31 €

  • Teen Natak
    Rahul Sankrityayan
    पंडित : दुनिया में ई दुख-सुख सब पुरुबिला करम से हा। हमरा सर-कार एतना साधु- महतिमा, देवी देवता के सेवा-टहल दान-पुन्न करत बाड़ें, एकर फल ओनके आगे मिली। हमरा अमहरा के लखपती महाजन लोटनसाहु जे नौका ठकुरबाड़ी बनवलै हाँ, सदाबरत लगौले बाड़ें, एकर फल बाँव ना जाई। एहि जिनगी के पुन्न के फल भोग-सुख अगिला जनम में मिली नोहर ! पछिले जनम के कइल पुन्न के फल एहि बखत मिलि रहल बा।नोहर : पुन्न के फ...
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    12,13 €

  • Divodas
    Rahul Sankrityayan
    अपने जन को सब तरह से सुखी और समृद्ध बनाने का निश्चय दिवोदास ने कर लिया था। अपने परिवार के लिए उसे चिन्ता नहीं थी। पिता द्वारा अर्जित पशु और धन उसके पास पर्याप्त था। अपनी स्वाभाविक रुचि तथा ऋषि की शिक्षा के कारण उसमें कोई व्यसन नहीं था। सरल, परिश्रमी जीवन उसे पसन्द था। पर, जब तक सारा जन कष्ट से मुक्त न हो, तब तक वह कैसे चैन ले सकता था? विपाश (व्यास), शतद्रु और परुष्णी के बीच की ...
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    13,35 €

  • Baisavi Sadi
    Rahul Sankrityayan
    सड़ा गला, खराब अन्न भी उस समय करोड़ों आदमियों को पेट भर न मिलता था। कितने ही लोग पेट के लिए गाँव-गाँव भीख माँगते फिरते थे। मैंने अपनी आँखों से अनेक स्थानों पर ऐसे लड़कों और आदमियों को देखा था, जो कि, फेंके जाते जूठे टुकड़ों को कुत्तों के मुँह से छीनकर खा जाते थे। यह बात नहीं, कि लोग परिश्रम से घबराते थे। दो-चार चाहे वैसे भी हों; किन्तु अधिकतर ऐसे थे, जो रात के चार बजे से फिर रा...
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    13,35 €

  • Sone ki Dhal
    Rahul Sankrityayan
    प्रस्तुत पुस्तक सोने की ढाल वैचारिक धरातल पर राहुल जी का एकदम नया प्रयोग है। हिन्दी के प्रारम्भिक काल में देवकीनन्दन खत्नी ने तिलस्मी और जासूसी उपन्यासों की बुनियाद डाली थी-यह उसी टूटी धारा को जोड़ने का एक सफल प्रयास है जो लेखक के बहु-आयामी कर्तृत्व को प्रकट करता है। राहुल जी ने विविध विषयों पर अपनी लेखनी चलाई है, किन्तु इस पुस्तक की विषय-सामग्री काल्पनिक और रहस्यभरी है। इसके प...
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    15,41 €

  • Soodkhor Ki Maut
    Rahul Sankrityayan
    जुए की आमदनी से महरूम होकर कारी ने अब अपनी सारी शक्ति को सूदखोरी, कुरानफुरोशी तथा कर्जदारों और किरायेदारों के घर आश खाने में लगा दिया। जब वह बड़ा हुआ और पैसा भी उसके पास अधिक हो गया, तो उसने छोटे सूदखोरों का पीछा छोड़ दिया, क्योंकि उसमें उसका कुछ पैसा डूब जाता था। अब उसने बड़े-बड़े दुकानदारों और सौदागरों के साथ लेने-देन शुरू किया। बड़े बायों (सेठों) के यहाँ उसका पैसा बिलकुल नही...
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    12,25 €

  • Adeena
    Rahul Sankrityayan
    यात्रा का दिन आ गया। अदीना के फटे कपड़े भी सिल चुके थे। रास्ते के लिये कुछ रोटी और खाने की चीजें भी तैयार हो चुकी थी। वादे के अनुसार संगीन भी आ पहुँचा। इस दिन के लिये बीबी आइशा ने खास तौर से घी के साथ पुलाव पकाया था। उन्होंने मिलकर खाना खाया, खुर्जी और थैले को गधे पर लाद बीबी आइशा ने अदीना को अपनी गोद में दबा लिया। बेचारी के ताकत नहीं थी, कि कोई बात कहती। वह केवल अपनी आँखों से ...
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    14,42 €

  • Samyawad Hi Kyon
    Rahul Sankrityayan
    हमारे देश की गरीबी ऐसी नहीं है जिसका इलाज न हो। सभी साधन रहते भी हम बेबस हैं, क्योंकि हम उन साधनों का इस्तेमाल कर नहीं सकते। मनुष्य का श्रम ही तो धन है। भारत के पैंतीस करोड़ आदमियों में अठारह करोड़ आदमी तो अवश्य काम कर सकते हैं। आजकल उनमें से थोड़े तो धनी होने के कारण काम करने में अपनी हतक समझते हैं। यही नहीं, उनको अपने शरीर की देख-भाल, सेवा टहल के लिए भी दर्जनों आदमी चाहिए। वह...
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    10,85 €

  • Tumhari Kshay
    Rahul Sankrityayan
    एक तरफ़ प्रतिभाओं की इस तरह अवहेलना और दूसरी तरफ़ धनियों के गदहे लड़कों पर आधे दर्जन ट्यूटर लगा-लगाकर ठोक-पीटकर आगे बढ़ाना। मैं एक ऐसे व्यक्ति को जानता हूँ जिसके दिमाग़ में सोलहों आने गोबर भरा हुआ था, लेकिन वह एक करोड़पति के घर पैदा हुआ था। उसके लिए मैट्रिक पास करना भी असम्भव था। लेकिन आज वह एम.ए. ही नहीं है, डॉक्टर है। उसके नाम से दर्जनों किताबें छपी हैं। दूर की दुनिया उसे बड़...
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    10,57 €

  • Islam Dharm ki Rooprekha
    Rahul Sankrityayan
    हिन्दू-धर्म में जैसे अनेक सम्प्रदाय तथा उनके सिद्धान्तों में परस्पर भेद है, वैसे ही ’इस्लाम’ की भी अवस्था है। इन कठिनाइयों से बचने के लिए मैंने ’कुरान’ के मूल को उन्हीं शब्दों में केवल भाषा के परिवर्तन के साथ ’इस्लाम धर्म’ को रखने का प्रयत्न किया है। बहुत कम जगह आशय स्पष्ट करने के लिए कुछ और भी लिखा गया है। ग्रन्थ लिखने का प्रयोजन हिन्दुओं को अपने पड़ोसी मुसलमान भाइयों के धर्म ...
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    12,26 €

  • Stalin
    Rahul Sankrityayan
    दुनिया की अनेकों भाषाओं में स्तालिन की जीवनी या जीवनियों का अभाव नहीं, यद्यपि उनमें कितनी ही बातों की कमियाँ देखी जाती है। पर, हिन्दी में तो प्रायः उनका अभाव ही है। वैसे स्तालिन के ऐतिहासिक जीवन ही नहीं, बल्कि भावी संसार के पथ- प्रदर्शक के रूप के प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट करना भी एक उद्देश्य हो सकता था, जिसके कारण मुझे लेखनी उठानी पड़ती। मैं यह मानता हूँ कि इस जीवनी में भी एक त्...
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    19,64 €

  • Jeene ke liye
    Rahul Sankrityayan
    ''इतनी उम्मीद न थी। वादों को भूल जाने की ही बात नहीं, बल्कि यह उल्टी छुरी से गला रेतना है। क्या ’सत्य अहिंसा’ का पालन इसी तरह होता है?'' हरनंदन ने कांग्रेसी मंत्रिमण्डल के सवा साल के कार्यों पर टिप्पणी करते हुए कहा।''सत्य और अहिंसा! क्या देख नहीं रहे हो. कैसी-कैसी सूरतें अब तिरंगे झंडे के नीचे खड़ी हो रही हैं?'' कमाल ने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा- ''रायबहादुर केशव सिंह सरकारी वक...
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    18,64 €

  • Meri Tibbat Yatra
    Rahul Sankrityayan
    यह हिंदी व्याकरण काशी नागरीप्रचारिणी सभा के अनुरोध और उत्तेजन से लिखा गया है। सभा ने लगभग पाँच वर्ष पूर्व हिंदी का एक सर्वागपूर्ण व्याकरण लिखने का विचार कर इस विषय के दो-तीन ग्रंथ लिखवाए थे, जिनमें बाबू गंगाप्रसाद एम. ए. और पं. रामकर्ण शर्मा के लिखे हुए व्याकरण अधिकांश में उपयोगी निकले। तब सभा ने इन ग्रंथों के आधार पर अथवा स्वतन्त्र रीति से, विस्तृत हिंदी व्याकरण लिखने का गुरु...
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    16,54 €

  • Dimagi Gulami (दिमागी गुलामी)
    Rahul Sankrityayan
    लेखक के अनुसार ’दिमागी गुलामी’ से तात्पर्य मानसिक दासता से है। ये मानसिक दासता प्रान्तवाद, क्षेत्रवाद, जातिवाद व राष्ट्रवाद के नाम पर मनुष्य के मन-मस्तिष्क को जकड़ लिया है। मनुष्य की सोच इन्हीं बातों पर टिकी है जिससे संकीर्णता की भावना ने अपना प्रभाव जमा लिया है। लेखक कहते हैं आज जिस जाति की सभ्यता जितनी पुरानी होती है उनके मानसिक बंधन भी उतने ही अधिक जटिल होते हैं। हमारी सभ्य...
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    9,18 €

  • Jeene ke Liye (जीने के लिए)
    Rahul Sankrityayan
    जीने के लिए लेखक का पहला उपन्यास है जिसमे जीवन का संघर्ष आपको देखने को मिलेगा यह उपन्यास तब लिखा गया था जब लेखक छपरा जेल में ढाई महीने रहे तभी इस खूबसूरत उपन्यास का सृजन हो पाया राहुल सांस्कृत्यायन की खासियत यह है कि इनकी रचनाएँ असाधारण होती हैं कुछ भी विचार अपने धरातल में रहते हैं राहुल सांकृत्यायन जिनका साहित्य क्रांति की मसाल के समान है इनका साहित्य समकालीन की जरुरत है जहाँ...
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    17,51 €

  • Singh Senapati (सिंह सेनापति)
    Rahul Sankrityayan
    राहुल जी के साहित्य के विविध पक्षों को देखने से ज्ञात होता है कि उनकी पैठ न केवल प्राचीन नवीन भारतीय साहित्य में थी, अपितु तिब्बती, सिंहली, अंग्रेजी, चीनी, रूसी, जापानी आदि भाषाओं की जानकारी करते हुए सतत साहित्य को भी उन्होंने मथ डाला। राहुल जी जब जिसके सम्पर्क में गये, उसकी पूरी जानकारी हासिल की। जब वे साम्यवाद के क्षेत्र में गये, तो कार्ल मार्क्स, लेनिन, स्तालिन आदि के राजनीत...
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    17,54 €

  • Volga Se Ganga
    Rahul Sankrityayan
    बोल्गा से गंगा’ राहुल सांकृत्यायन द्वारा लिखी गई बीस कहानियों का संग्रह है। इस कहानी-संग्रह की बीस कहानियाँ आठ हजार वर्षों तथा दस हजार किलोमीटर की परिधि में बँधी हुई हैं। राहुल सांकृत्यायन द्वारा लिखी गयी यह कहानियाँ भारोपीय मानवों की सभ्यता के विकास की पूरी कड़ी को सामने रखने में सक्षम हैं। राहुल सांकृत्यायन ने इस कहानी संग्रह में 6000 ई.पू. से 1942 ई. तक के कालखंड में मानव स...
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    22,05 €

  • From Volga to Ganga
    Rahul Sankrityayan
    Rahul Sankrityayan (1893-1963) was a polymath and polyglot. A pioneering explorer-traveller, he is known not only for his travelogues but also for contributions to history, philosophy, memoir-writing, polemics, biography, drama, translation, lexicography, critical commentary on and emendation of rare Buddhist philosophical texts recovered from Tibet, and diverse fiction, mostly...
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    24,99 €