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भारतीय चिंतनधारा के विकास में ऋग्वेदकाल के बाद षड्दर्शनों का अत्यंत महत्त्व है। जब हम परंपरा की बात करते हैं तो वेद, ब्रह्मसूत्र, उपनिषद् और गीता जैसे ग्रंथों से ही हमारा तात्पर्य होता है। क्योंकि परंपरा का अर्थ है जो हमारे पावत्र-आर्यग्रंथों में लिखा है। अतः पूरी भारतीय परंपरा को जानने के लिए दर्शनों का अध्ययन आवश्यक हो जाता है। इसीलिए हमने संक्षेप में और सरल भाषा में विभिन्न दर्शनों की व्याख्या प्रस्तुत की है।