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भारत के कोने-कोने से श्रद्धालु यात्री ठठ-के-ठठ बारहों महीने इस महातीर्थ में आते और सोमनाथ के भव्य दर्शन करते थे। अनेक राजा-रानी, राजवंशी, धनी-कुबेर, श्रीमंत-साहूकार यहां महीनों रुके रहते थे और अनगिनत धन-रत्न, गांव-धरती सोमनाथ के चरणों में चढ़ा जाते थे।
उसी अवर्णनीय, अतुलनीय वैभव से युक्त सोमनाथ के पतन की करुण कथा है इस उपन्यास में ओर है सुलतान महमूद गजनवी के सत्रहवें आक्रमण की क्रूर कहानी।
इसमें वीरता और निष्ठा भी है, तो कायरता और विश्वासघात की घृणित तस्वीर भी। कहीं स्नेह और प्रेम के धागे हैं, तो कहीं निष्ठुरता और ज़ुल्म के बर्छे-भाले भी।
यह एक ऐसा उपन्यास है, जो पाठक के सामने एक पूरे युग का सम्पूर्ण चित्र खड़ा कर देता है। एक-एक दृश्य जीता-जागता और दिल को छू लेने वाला है।