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'लेकिन घर आकर उसने ज्योंही वह प्रस्ताव किया कि कुहराम मच गया । धनिया तो कम चिल्लाई, दोनों लड़कियों ने तो दुनिया सिर पर उठा ली । नहीं देते अपनी गाय, रुपये जहाँ से चाहो लाओ । सोना ने तो यहाँ तक कह डाला, इससे तो कहीं अच्छा है, मुझे बेच डालो । गाय से कुछ बेसी ही मिल जायेगा । होरी असमंजस में पड़ गया । दोनों लड़कियां सचमुच गाय पर जान देती थी । रूपा तो उसके गले से लिपट जाती थी और बिना उसे खिलाये कौर मुँह में न डालती थी । गाय कितने प्यार से उसका हाथ चाटती थी, कितनी स्नेहभरी आँखों से उसे देखती थी । उसका बछड़ा कितना सुन्दर होगा । अभी से उसका नामकरण हो गया था-मटरू । वह उसे अपने साथ लेकर सोयेगी । इस गाय के पीछे दोनों बहनों में कई बार लड़ाइयों हो चुकी थीं । सोना कहती, मुझे ज्यादा चाहती है, रूपा कहती, मुझे । इसका निर्णय अभी तक न हो सका था । और दोनों दावे कायम थे ।' - उपन्यास से।