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कोहिनूर: ’रोशनी के पहाड़’ की अदृश्य सिसकियाँ और सदियों का प्रतिशोधयह कोई साधारण इतिहास की किताब नहीं है, बल्कि उस ’रक्त-रंजित’ रत्न का काला चिट्ठा है जिसने दुनिया के सबसे शक्तिशाली साम्राज्यों को मिट्टी में मिला दिया। सोढा इकबाल कासम ने उन तथ्यों को सामने रखा है जिन्हें आज तक ’संयोग’ कहकर झुठलाया जाता रहा। मुगल साम्राज्य की बर्बादी का गवाहगोलकुंडा की खदान से निकलते ही इस हीरे ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया था। इस किताब में विस्तार से बताया गया है कि कैसे इस एक हीरे के लिए बाप ने बेटे को कैद किया और बेटों ने बाप की गर्दन काट दी। मुगलों का वह आलीशान तख़्त-ए-ताऊस, जिसकी रूह कोहिनूर था, कैसे उनके विनाश का सबसे बड़ा कारण बना और एक पूरे खानदान को सड़कों पर ले आया। ब्रिटिश राजघराने का मौन खौफ जहाँ अंग्रेज लेखक इस सच को छिपाते रहे, सोढा इकबाल कासम ने उस पर्दे को फाड़ दिया है। प्रिंस अल्बर्ट की मात्र 42 साल की उम्र में रहस्यमयी मृत्यु और उसके बाद ब्रिटिश हुकूमत पर टूटे दुखों के पहाड़-यह किताब प्रमाण देती है कि क्यों दुनिया की सबसे ताकतवर रानियां और शहजादे इस मुकुट को पहनने से कांपने लगे थे। आज भी लंदन के सुरक्षित तहखानों में छिपा यह हीरा उन ’अदृश्य सिसकियों’ और परेशानियों का केंद्र बना हुआ है जिन्हें ब्रिटिश एजेंसियां सुलझाने में नाकाम हैं। 2026: तकनीक और कूटनीति का आखिरी हिसाब यह किताब केवल अतीत का शोक नहीं मनाती, बल्कि 2026 की आधुनिक तकनीक और बदलती वैश्विक कूटनीति के आईने में कोहिनूर की वापसी का वह सच दिखाती है जिसे अब और दबाना नामुमकिन है। आज की तारीख में ब्रिटेन जिस कूटनीतिक दलदल और अंदरूनी परेशानियों से गुजर रहा है, उसका इस हीरे से क्या संबंध है? सच का बेबाक दस्तावेज़ 88 किताबों का निचोड़ और दशको