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'ज़िन्दगी... तेरी ओर।' एक सफ़रनामा है लेखिका का ज़िन्दगी के साथ। कैसे वो सालों ख़ुद की खोज में भटकते सिक्किम के पहाड़ों में ध्यान (विपासना) के लिए अकेली जा पहुंचती हैं। सालों एक कमरे में घर से सब से दूर बिताने के बाद उसको अहसास होता है कि ये कमरे की चारदीवारी, जो उसकी साथी हुआ करती थी जो सब से उसको बचा लिया करती थी अब धीरे धीरे कर उसे मारने लगी है। वो उस कमरे से कुछ दिनों के लिए दूर चले जाना चाहती हैं। उस कमरे से इतना दूर ये उसका पहला सफ़र है। सिक्किम में गुजारे उन 12 दिनों में वो बीती सारी ज़िन्दगी को नए सिरे से देखती हैं। अपनी सारी बदगुमानिया, शिकायतें और ख़ौफ़ जो उसने बीते वक्त में इकट्ठा किये थे वही छोड़, ज़िन्दगी की तरफ़ चल पड़ती हैं। ख़ुद के साथ बितायें ये 12 दिन कैसे उसके वजूद को, पुराने विश्वास को नया आकार देते हैं? अपने पुराने लिबास को उतार जो उसने बचपन से अब तक ओढ़ रखा था, वापिस लौटती हैं।