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ये कृति 'वो-तुम-मैं और इश्क', आपके अंतर्मन में छिपी हुई प्रेम और इश्क की भावना को कुछ गीत और ग़ज़लों के माध्यम से गुदगुदाने को प्रस्तुत है। हमको समझना चाहिए कि 'वो' के बिना 'तुम' और 'मैं' कुछ नहीं हैं। और रही बात प्रेम या इश्क़ की, तो प्रेम पूर्ण है और इश्क़ पूर्णता कि इच्छा रखता है और ये दोनो ही हमारे जीवन को रंगीन बनाते हैं। इन्ही अथाह रंगों में से कुछ रंग, कविताओं और ग़ज़लों में बाँध कर, आपके समक्ष प्रस्तुत है और आशा है कि पाठकों को मानसिक पटल पर पूर्णता का एहसास कराएगा। रचनाओं में वंदना, बचपन के कुछ यादें, प्रकृति के गर्भ में छिपे प्रेम की पहचान और इसको परिभाषित करने के चेष्टा है। इसके साथ इश्क और प्रेम में मिलन, जुदाई, और दो व्यक्तित्वों के जटिल समीकरण को हास्य और व्यंग से भी व्यक्त करने की कोशिश की गयी है। और अंत में, यह रचना हमारे जीवन को समर्पित है, जो कि एक अविरल धारा है और जिसमे ये दुनिया अपने हिसाब से रंग भरती है। खुशियाँ और दुःख इस जीवन के अभिन्न अंग है और कभी कभी एक सुकून की तलाश ही जीवन का उद्देश्य बन जाती है। कोशिशें होगी, तो नाकामियाँ भी होंगी, मेरी मेहनतों में, कुछ खामियां भी होंगी । मैने कब कहा, ख़ुदा सी तरबियत है मेरी, इंसा हूं, इंसानों सी कुछ खूबियाँ भी होगी ।। नहीं फ़िक्र मुझको, अपनी मंजिल की, ग़र रास्ते हैं, तो कहीं मंजिल भी होगी । अभी नहीं आया, मेरे इम्तहान का वक्त, फ़तह से पहले, कयामत भी भी नहीं होगी ।।