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Librería Elías (Asturias)
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एक वक्त था जब देश में अख़बार जगत की गतिविधियाँ अपरिभाषित, लेकिन सख्त नियमों से बंधी हुई थीं I और यह बात 1980 के दशक तक लागू रही, जब तक द टाइम्स ऑफ़ इंडिया, इकोनॉमिक टाइम्स समेत अन्य कई प्रकाशनों के स्वामी बेनेट, कोलमैन ऎण्ड कंपनी लिमिटेड ने नियमों को पुनः परिभाषित कर अपने अनुसार नए नियम नहीं बना लिए I फिर मामला चाहे अख़बार की कीमत का हो या उनमें प्रकाशित होने वाले विज्ञापनों व सम्पादकीय स्वतंत्रता का I अगले दो दशक में भारतीय अख़बार जगत की सूरत पूरी तरह बदल गई I टाइम्स ग्रुप ने किस तरह भारतीय मीडिया बिज़नेस को पूरी तरह बदल डाला, इस बारे में अधिक जानकारी उबलब्ध नहीं है I टाइम्स ऑफ़ इंडिया की ही एक पूर्व पत्रकार संगीता मल्हन ने टाइम्स ग्रुप की इस विस्तृत गाथा को पाठकों तक पहुँचाने की कोशिश की है I उन्होंने उस दौर के ऐसे कई पत्रकारों और कॉर्पोरेट जगत के नामी-गिरामी लोगों से विस्तार में बातचीत की जिन्होंने समाचार-पत्र के रूपांतरण में मुख्य भूमिका निभाई I जो सच्चाई उभरकर आई, वह एक अहिरन कर देने वाले अहं के टकराव, बदलते दृष्टिकोण और कॉर्पोरेट जगत के बदलते स्वरूप की अनोखी कहानी थी I ख़बरों की दुनिया से सीधे या परोक्ष रूप से जुड़े और भारत में समाचारों के निर्माण में रुचि रखने वाले हर व्यक्ति को यह पुस्तक ज़रूर पढ़नी चाहिए I