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कोई शिकवा कोई किस्सा पुराना ढूँढ लेते हैं हम उन से रोज़ मिलने का बहाना ढूँढ लेते हैं ख़ुशी और ग़म मैं जीने का सलीक़ा जिनको आता है ख़िज़ाँ की रुत में भी मौसम सुहाना ढूँढ लेते हैं दलीलें कितनी ही दीजे वो क़ायल ही नहीं होते सताने के लिए कुछ भी बहाना ढूँढ लेते हैं नज़र से उसकी बच जाओगे ख़ुशफ़हमी में मत रहना ख़ुदा के तीर खिड़ अपना निशाँ ढूँढ लेते हैं ’मंज़र’ की हौसलामन्द तबियत चन्द मुशायरों पर अपनी छाप छोड़ के मुत्मईन नहीं हो सकी. वह तो एक सदी पर अपनी छाप छोड़ना चाहते हैं. ’मंज़र’ की उलुलअज़मी मैं वही मासूमियत है जो उस बच्चे की हुकुम में पाई जाती है जो br>चाँद को पकड़ने के लिए मान की गोद में बार-बार मचलता है. मुशायरों के नाम पर आजकल जो मेले लगते हैं उनमें कामयाबी के लिए, ’मंज़र’ भोपाली की आवाज़ काफ़ी है. खुशगुलुई के साथ-साथ उनके यहाँ फ़िक्र भी पाई जाती है और अपने माहौल, अपने ज़माने से बाख़बर भी हैं. उन्हें यह हक़ पहुँचता है कि वह बढ़ जाने कि कोशिश करें, अगर वह ऐसा करें तो मेरी दुआएं उनके साथ हैं. -कैफ़ी आज़मी.