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’तंत्र शास्त्रीय प्रतीक है, विस्तार का प्रतीक, महाशून्य का प्रतीक-जिससे सारा संसार उद्भुत होता है। मन्त्र का जप यदि षट्चक्रों का भेदन करता है तो तन्त्र प्रतीकों, पदार्थों और चित्रो के माध्यग रो भेदन की इसी प्रक्रिया को व्यक्त करता हुआ ब्रह्मण्ड के रहस्य का उद्घाटन करता है। शिव तो स्वयं संसार के आदि ज्ञान हैं। उनके द्वारा रचित ’शिव तन्त्र’ सिद्धि ज्ञान सिर्फ आध्यात्म शक्ति सम्पन्न तपोनिरत ऋषियों को ही प्राप्त होता था। आज जन साधारण तक आदि ज्ञान, ऋदि-सिद्धि का स्त्रोत ’शिव तन्त्र’ सुलभ कराने का एक अद्वितीय उपाय जिसमें स्वामी कृष्णानन्द जी ने अपने अध्यात्म ज्ञान उच्च तत्वों की भरपूर वर्षा कर दी है।
सम्मानीय स्वामी श्री कृष्णानन्द जी द्वारा रचित ’शिव तन्त्र’ के अध्ययन बिना प्रत्येक प्राणी उसी तरह अज्ञानी रहता है जिस प्रकार बिना सूर्य के यह पृथ्वी अन्धकारमय रहती है।