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इस पुस्तक का शीर्षक रावण चबूतरा भी मुझे वही से मिला, जहां हम सभी दोस्त शैतानियां करते थे। दशकों बाद मैंने गांव की गलियों और उन सभी स्थलों को देखा जो मानस पटल पर अंकित थे। बचपन के बाद यह सब देखने का नज़रिया और सोच अलग था। यह सब देखते-देखते मुझमें ही बड़ा बदलाव दिखा। रावण चबूतरा उसी बदलाव का प्रतिबिंब है। सब कुछ बदला जा सकता है परंतु दोस्ती नहीं। दोस्ती सही हो तो रिश्ते भी राह बदल देते है। समय व्यक्ति को बहुत कुछ सिखाता है।पुस्तक के संपादन में अनुज वरिष्ठ पत्रकार शाश्वत तिवारी के महती योगदान के लिए उनका धन्यवाद। यह पुस्तक मेरे बचपन के सभी दोस्तों और गांव वासियों को समर्पित है।