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यह रचना ’रेत की रबाब’ सूफियों की बेबूझ दुनियाँ को ज़ाहिर करती दस्तावेज़ है। सदियों से बगावती इश्क का परचम उठाए ये दीवाने, आज भी रहस्य के परदे के पीछे से ही बोलते हैं। अरब के गर्म रेगिस्तानों में पैदा हुई इस रबाब के सुर कितने सुरीले हैं, इसी हकीकत को ज़ाहिर करती है - रेत की रबाब । सूफ़ी फ़सानों पर लेखक की पकड़, ज़रुरी बातों की तफ़सील और मुलायम कलम पाठक को सूफियों के बहुत क़रीब ले आती है। सूफियों में प्रचलित किताब के उन्वान खुदा के निन्यानवे नामों की याद दिलाते हैं। शायद ’रेत की रबाब’ से सूफ़ियों के बारे में छाई धुंध कुछ और साफ़ हो सके।