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रवीन्द्रनाथ एक ऐसे लोक कवि थे जिनका केंद्रीय तत्त्व आदमी की भावनाओं का परिष्कार करना था। वह मनुष्य मात्र के स्पंदन के कवि थे। एक ऐसे चित्रकार जिसके रंगों में शाश्वत प्रेम की गहरी अनुभूति है, एक ऐसा नाटककार जिसके रंगमंच पर सिर्फ ’त्रादसी’ ही जिंदा नहीं है, मनुष्य की गहरी जिजीविषा भी है। एक ऐसा कथाकार जो अपने आस-पास से कथालोक चुनता है, बुनता है, सिर्फ इसलिए नहीं कि घनीभूत पीड़ा की आवृत्ति करे या उसे ही अनावृत करे बल्कि उस कथालोक में वह आदमी के अंतिम गंतत्व की तलाश भी करता है। वर्तमान की गवेषणा, तर्क और स्थितियों के प्रति वह सदैव सजग रहे। यही कारण है कि रवीन्द्र क्षितिजीय आकांक्षा के लेखक हैं।