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मनुष्य के इतिहास में अंतिम शब्द बुराई नहीं है, नफ़रत नहीं है, युद्ध नहीं है, और मृत्यु भी नहीं है’ - पोप फ्रांसिस का अंतिम संदेश छह साल की अवधि में लिखी गई यह किताब शक्तिशाली और रहस्योद्घाटनों से भरी ऐसी पहली आत्मकथा है जिसे पदासीन पोप ने लिखी हो। यह किताब बीसवीं सदी के शुरुआती वर्षों में पोप फ़्रांसिस की इतालवी जड़ों के साथ शुरू होकर अर्जेंटीना में उनके बचपन, उनके आध्यात्मिक झुकाव और वयस्क होने के बाद से लेकर उनके पोपत्व के उत्तरार्ध तक के बारे में है। इन स्मृतियों के साथ पोप फ़्रांसिस ने अपने पोपत्व के कुछ महत्त्वपूर्ण क्षणों के बारे में बेबाकी से और युद्ध व शांति (यूक्रेन और पश्चिम एशिया सहित), प्रवासन, पर्यावरण संकट, सामाजिक नीतियों, महिलाओं की स्थिति, यौनिकता, तकनीकी विकास, सामान्य रूप से चर्च और धर्म के भविष्य और आगामी वर्षों में मानवता के समक्ष आईं चुनौतियों के बारे में स्पष्ट ढंग से लिखा है। यह पुस्तक भावी पीढ़ियों के लिए पोप फ्रांसिस की आशाओं की एक विरासत है, जो चर्च के ’होप के जयंती वर्ष’ में प्रकाशित हो रही है। यह संस्मरण उल्लेखनीय तस्वीरों के साथ मार्मिक, ज्ञानवर्धक और रोचक है। साथ ही, यह एक पठनीय किताब भी है।