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पल भर का मृदु प्यार दोहामुक्तक संग्रह पल भर का मृद्ध प्यार डॉ. मधुसूदन साहा दोहा से दोहामुक्तक तक दोहा भारतीय काव्य की प्राचीनतम और लोकप्रिय विधा है। वैदिक काल से लेकर मात्र तक इस उद में लोकानुभूतियों की अभिव्यक्ति होती रही है। दो पंक्तियों में गहन भाव व्यक्त करने की क्षमता के कारण इसे गागर में सागर' और 'चामन में बिराट’ कहा गया है। आदिकाल से रीतिकाल तक चंदबरदाई, अमीर खुसरो, कबीर तुलसी, रहीम और बिहारों जैसे कवियों ने इसे उत्कर्ष दिया। आधुनिक काल में पं. देवेंद्ररामर्श उन्द्र और बाद में कई कवियों ने सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक यथार्थ को दोहों में अभिव्यक्त किया। उर्दू शायरों ने भी इसे अपनाया। विशेषतः जहीर कुरैशी ने दोहे और राजल के संगम ’दोहा-गज़ल की परिकल्पना कर इस घंद को नया आयाम दिया। उनका मानना था कि शेर और दोहा दोनों ही संधिधता और स्पष्टता के कारण लोकप्रिय है। उन्होंने दोहा-नाज़लों की पुस्तक भी प्रकाशित की। लेखक मानते हैं कि जाहीर कुरैशी ही उनके दोहामुक्तक लेखन के प्रथम प्रेरक रहे।