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तथ्य, इतिहास, हृदयस्पर्शी नेहाख्यान इस सब के मध्य से गुजरते हुए यह उपन्यास 1975 में लगाये गये आपातकाल की घटनाओं के ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित एक मर्मस्पर्शी कहानी कहता है। हिन्दी में आपातकाल की काली अंधेरी रातों के इतिहास का समुचित और प्रामाणिक अभिलेखन या डॉक्युमेंटेशन नहीं हुआ है। इक्कीस माह तक चले आपातकाल में एक लाख से अधिक लोगों को जेलों में ठूंसा गया, कितने ही निर्दोष नागरिकों को एक असंवैधानिक चौकड़ी के द्वारा किये गये अत्याचारों के भयंकर आतंक की वेदना को सहना पड़ा, हजारों-लाखों को बेघरबार हो जाना पड़ा, जिससे दिल्ली में साढे छः सौ वर्ष पूर्व के मुहम्मदशाह तुगलक के अत्याचारों की याद फिर से ताजा हो आई!
दिल्ली से भाग कर कहीं दूर एक छोटे से कस्बे में दो महीने तक छुप कर रहने को विवश विक्रम को न सिर्फ पुलिस और प्रशासन से संघर्ष करना पड़ता है, बल्कि आपातकाल के विरुद्ध उसके संघर्ष में उसके साथ जुड़ने को आतुर मंजू को लेकर भावनात्मक स्तर पर भी उसका संघर्ष चलता है। इस सबके अन्त में, 21 मार्च 1977 का नया सवेरा इस सारे संघर्ष से तप कर निकले भारत के युवा का अभिनन्दन करता है। उस कालरात्रि के प्रत्यक्षदर्शी रहे एक पत्रकार की कलम से पाठक को बाँधे रखने वाली एक मर्मस्पर्शी गाथा...