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इस शेरी मज्मूआ ’नवा-ए-रफ़ी’ में शामिल तमाम अशआर ज़बानो-बयान और मआनी-ओ-मतालिब के ऐतबार से एक ख़ास क़ूवते-फ़िक्र-ओ-कुहना मश्की की दलील है। अपनी सीरत व शख़्सियत को सँवारने और उस्तवार करने में जनाब रफ़ी यूसुफ़पुरी साहब को कैसी सब्र-आज़मा आज़माइशों से गुज़रना पड़ा है उसकी झलक आपके कलाम में साफ़ तौर पर देखने को मिलती है। जनाब रफ़ी यूसुफ़पुरी साहब के कलाम में जिद्दत के साथ-साथ क़दीम रंग भी झलकता दिखाई देता है आपकी ग़ज़लों में ज़ियादातर अशआर तसव्वुफ़ और इरफ़ाने-हक़ पर मबनी होते हैं। यह शेरी मज्मूआ ’नवा-ए-रफ़ी’ मुहतरम ’रफ़ी’ यूसुफ़पुरी साहब की ज़िंदगी भर की अदबी काविशों का अदबी समरा और उनके सबसे अहम तरीन ख़्वाब की एक हसीन ताबीर है जो आज हम सबके हाथों में एक किताबी शक्ल में मौजूद है। यह किताब बदक़िस्मती से उनकी हयात में किन्हीं वजूहात से मंज़रे-आम पे न आ सकी थी जिसका उन्हें आख़िरी वक़्त में बेहद मलाल रहा।