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डॉक्टर नरेंद्र कोहली के लेखन ने किस प्रकार कई पीढियों और देश के सर्वश्रेष्ठ मष्तिष्कों को प्रभावित किया है । नरेन्द्र कोहली की पुस्तक ’प्रछन्न’ का कांस्टीट्यूशन क्लब में *श्री अटलबिहारी बाजपेयी* द्वारा जनवरी, 1997 में लोकार्पण किया गया था । मैं कार्यक्रम का संचालन कर रहा था । प्रेम जनमेजय भी चर्चा करने वालों में थे। नरेंद्र कोहली जी की पुस्तक ’प्रच्छन्न’ की व्याख्या और विश्लेषण करते हुए अटल जी ने अपने भाषण में कहा कि मैंने आज तक कर्ण को वंचित व्यक्तित्व के रूप में को देखा था और मेरी उसके साथ गहरी सहानुभूति रही है। परंतु नरेंद्र कोहली जी ने कर्ण के व्यक्तित्व की जो व्याख्या की है और जिस प्रकार से द्रौपदी के चीरहरण के समय उसके व्यवहार को रेखांकित करते हुए उसके व्यक्तित्व का चित्रण किया है, उसके पश्चात मैं कर्ण के व्यक्तित्व को दोबारा से देखने और विचार करने की आवश्यकता महसूस कर रहा हूँ। इतने वरिष्ठ राजनेता जिनसे केवल आशीर्वाद, मार्गदर्शन या ’अंतिम सत्य’ सुने जाने की अपेक्षा की जाती हो उनके द्वारा अपनी अवधारणाएं बदलने की बात करना, या उन पर दोबारा सोचने की बात करना इस बात का प्रतीक था कि शिखर पर पहुंच कर भी वे सरल, सहज और खुले थे। दूसरी तरफ यह *नरेंद्र कोहली जी* के लेखन की प्रखरता , सत्यता, ऐतिहासिकता और समग्रता में चीजों को समझने और संप्रेषित करने की क्षमता का भी प्रतीक है जिसने अटल जी जैसी शख्सियत को महाभारत के प्रमुख चरित्र को और उसके माध्यम से महाभारत पर नई दृष्टि से विचार करने को प्रेरित कर दिया।