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यह आश्चर्यजनक लगेगा, लेकिन तथ्य है, कि बाबर से लेकर बहादुरशाह जफ़र तक, लगभग सभी मुग़ल बादशाह शायर और कवि भी थे; और उन्होंने फारसी-उर्दू में ही नहीं, ब्रजभाषा और हिंदी में भी काव्य-रचना की । यह पुस्तक प्रमाण है कि जिस भी बादशाह को राजनीति और युद्धों से इतर सुकून के पल नसीब हुए, उन्होंने कवियों-शायरों को सक देने के अलावा न सिर्फ कविताएँ-गजलें लिखी, अपने आसपास ऐसा माहौल भी बनाया कि उनके परिवार कि महिलाएँ भी काव्य-रचना कर सकें । लिखित प्रमाण है कि बाबर की बेटी गुलबदन बेगम और नातिन सलीमा सुल्ताना फारसी में कविताएँ लिखती थीं । हुमायूँ स्वयं कवि नहीं था, लेकिन काव्य-प्रेम उसका भी कम नहीं था । अकबर का कला-संस्कृति प्रेम तो विख्यात ही है, वह फारसी और हिंदी में लिखता भी था । ’संगीत रागकल्पदुम’ में अकबर कि हिंदी कविताएँ मौजूद हैं । जहाँगीर, नूरजहाँ, फिर औरंगजेब कि बेटी जेबुन्निसाँ, ए सब या तो फारसी में या फारसी-हिंदी दोनों में कविताएँ लिखते थे । कहा जाता है कि शाहजहाँ के तो दरबार कि भाषा ही कविता थी । दरबार के सवाल-जवाब कविता में ही होते थे । दारा शिकोह का दीवान उपलब्ध है, जिसमे उसकी गजलें और रुबाइयाँ हैं । अंतिम मुग़ल बादशाह जफ़र कि शायरी से हम सब परिचित हैं । उल्लेखनीय यह कि उन्होंने हिंदी में कविताएँ भी लिखी जो उपलब्ध भी हैं । कहना न होगा कि हिंदी के वरिष्ठ आलोचक डॉ. मैनेजर पाण्डेय द्वारा सम्पादित यह संकलन भारत में मुग़ल-साम्राज्य कि छवि को एक नया आयाम देता है; इससे गुजरकर हम जान पाते हैं कि मुग़ल बादशाहों ने हमें किले और मकबरे ही नहीं दिए, कविता की एक श्रेष्ठ परम्परा को भी हम तक पहुँचाया है ।.