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भारत में भक्त कवियों की एक लम्बी परम्परा रही है। भक्तों की इस मणिमाला में मीरा कौस्तुभ मणि के समान है। उसकी आभा सबसे अधिक मोहक, सबसे अधिक प्रखर और सबसे अधिक जीवन्त है। मीरा को लोग गाते हैं, गुनगुनाते हैं, लेकिन विरले ही उसके पदों की आत्मा तक पहुंच पाते हैं। उसके पद सीधे-साधे हैं। वह कोई कवयित्री नहीं है। वह पद उसने प्रेम में गाये हैं। उसके वचनों में जैसा रस है, वैसा किसी और के वचनों में नहीं। आज भी मीरा का नाम हृदय में रस घोल जाता है। मीरा में भक्ति की जैसी सहज उद्भावना हुई है और कहीं भी नहीं हुई है। भक्त तो और भी हुए हैं लेकिन सब मीरा से पिछड़ से पिछड़ गए हैं। मीरा भक्ति जगत का जगमगाता हुआ तारा है।