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हम जानते तो इश्क़ न करते किस के साथ ले जाते दिल को ख़ाक में इस आरजू के साथथा अक्स उस की कामते दिलकश का बाग में आँखें चली गयी हैं लगी आब जू के साथखुदा-ए-सुखन मोहम्मद तकी उर्फ मीर तकी ’मीर’ (1723 -1810) उर्दू एवं फ़ारसी भाषा के महान शायर थे। मीर को उर्दू के उस प्रचलन के लिए याद किया जाता है जिसमें फ़ारसी और हिन्दुस्तानी के शब्दों का अच्छा मिश्रण और सामंजस्य हो । मीर का जन्म आगरा (अकबरपुर) में हुआ था । उनका बचपन अपने पिता की देखरेख में बीता। उनके प्यार और करुणा के जीवन में महत्त्व के प्रति नजरिये का मीर के जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा। जिसकी झलक उनके शेरो में भी देखने को मिलती है ।’मीर’ प्रेम के मामले में हमेशा असफल रहे और जीवन के इस बड़े भारी प्रभाव ने उनके अवचेतन मस्तिष्क में घर करके उनमें असाधरण कटुता भर दी।-इसी किताब से