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धर्मेन्द्र यथार्थ और कल्पना को गूँथकर ऐसी अतिवास्तविकता रचते हैं जो समाज में व्याप्त रूढ़ियों, अन्धविश्वासों और बुराइयों को खोलकर हमारे सामने रख देती है और हमें सोचने पर मजबूर कर देती है। एक प्रभावी अतिवास्तविकता रचने के लिये धर्मेन्द्र जादुई यथार्थ और विज्ञान फंतासी का उपयोग करने से भी नहीं हिचकिचाते। धर्मेन्द्र अपनी रचनाओं में नये प्रयोग करने के लिये जाने जाते हैं। इस उपन्यास में भी धर्मेन्द्र ने उपन्यास के प्रचलित शिल्प से हटकर एक नया प्रयोग किया है और पत्र लेखन शैली में उपन्यास की रचना की है। इस उपन्यास में उन्होंने एक समूची पीढ़ी के विद्रोह, संघर्ष, असफलता, मोहभंग और बदलते आदर्शों की कथा प्रेम को प्रतीक बनाकर प्रस्तुत की है।