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सालों पहले खो गयी मेरे बचपन की तस्वीर जिसे मैं कहीं रख कर भूल गया था, अचानक एक दिन माँ को मिल जाती है। माँ ने तस्वीर दिखाते हुए कहा कि, 'खुद ही चीजें रखकर भूल जाते हो और कहते हो कि चीज खो गयी।' अचानक मुझे ध्यान हुआ कि हम चीजों को खोते नहीं, बस उन्हें रखकर कहीं भूल जाते हैं। धीरे-धीरे हम उन्हें याद करना बंद कर देते हैं। एक समय के बाद वह भूलना इतना स्थायी हो जाता है कि लाख कोशिशों के बाद भी वह चीज याद नहीं आती और अंत में हम उस चीज को खो जाने का नाम दे देते हैं। माँ की कही हुई उसी बात की कोख से इस किताब का जन्म हुआ।