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मुहावरें और कहावतें किसी भी भाषा की जान होते हैं। वे कथन-भंगिमा में चार चांद लगा देते हैं और उसे अभिधा और लक्षणा से आगे ले जाकर व्यंजना बना देते हैं। वे प्रयोक्ता के अभिप्राय को रोचकता तथा गूढ़ता प्रदान करते हैं। यदि हम किसी के बारे में यह कहें कि उसे भाषा का तनिक भी समुचित ज्ञान नहीं है तो हमारे कथन में कोई रोचकता नहीं होगी। परन्तु यही बात यदि यूं कहें कि उसके लिए तो ’काला अक्षर भैंस बराबर’ है, तो बात में कहावत की चाशनी घुल जाएगी और सुनने वाला मंत्रमुग्ध हो जाएगा। मुहावरा अभिव्यक्ति में शान और जान दोनों डाल देता है। किसी की मुहावरेदार भाषा सुनकर हमें अहसास होता है कि हम ऐसे ख़ास व्यक्ति की बात सुन रहे हैं जो भाषा के सौन्दर्य से परिचित और अभिभूत है। मुहावरों और कहावतों की तरह ही लोकोक्तियों का प्रभाव भी ऐसा ही चमत्कारी होता है।