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काका हाथरसी की कविताई के बारे में दो शब्द भी बिना मन में हास्य सुख की लहर लाए नहीं रहे जा सकते। उनकी कविता में जितना हास्य रस है, उसके अनुपात में व्यंग भी कम नहीं है।हास्य अगर चौके हैं, तो चुटीले व्यंग इसलिए छक्के भर है क्योंकि मैदान में अभी सत्ते का चलन नहीं है।यह पुस्तक काका के इन्हीं अचूक छक्कों का आनन्द लेकर आपके पास आई है। उठाइये और पढ़िये-पढ़ाइये....