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मोहन राकेश ने अपनी रचनाओं में साहित्य की सभी पूर्व स्थापनाओं के हस्तक्षेप किया है। वे नई स्थापनाओं के लिए न तो कोई आग्रह करते हैं और न ही प्रतिज्ञा बँधते हैं। मानव मन, स्थितियाँ और उसके द्वंद्व की जटिलता व गहन-सघन संवेदना उनके पात्रों की दृष्टि में रहती है। आत्म-पूर्ण कलात्मक सहजता उनके लेखन की आधार रेखा प्रतीत होती है। यह कहना अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं होगा कि उनके द्वारा उद्धृत चिंतन उनके समय के समूचे साहित्य का उत्तर है। यदि आज उनके साहित्य-मूल्य को समझना चाहें तो उनके पत्रों से संवाद करना ज़रूरी-अनिवार्य है। ज्वालामुखी लेखन के संदर्भ में देखना महत्त्वपूर्ण है। विदुषी लक्ष्मी शर्मा की यह पुस्तक उसी यात्रा पर ले जाती है, जो अभी तक अवलोकित नहीं की गई। ऐसे स्थानों को खोलती है, जिनका अध्ययन लेखक की कृतियों में दृष्टिगत न होकर पत्रों में परिलक्षित होता है। ऐसा लगता है कि स्वयं मोहन राकेश ने अपनी कृतियों को समझने के लिए इस पुस्तक को प्रतिनिधि करने का दायित्व सौंपा है।