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स्मृतियों के गलियारों में विचरण करते इन ऑस्ट्रेलियाई हिन्दी रचनाकारों ने, जहाँ पीछे छूटे परिवेश को शब्दों में संजोया है तो वहीं नए परिवेश में स्थापित होने के संघर्षों की व्यथा को भी पन्नों पर उकेरा है। किसी को स्वदेश में छूटे किसी प्रियजन या प्रिय वस्तु की याद सताती है, तो किसी को प्रवास में जुड़े नये संबंध-सूत्रों की अपार खुशी उत्साह से भर देती है। कहीं ये रचनाकार स्वयं को स्थापित करने के लिए एड़ी-छोटी का जोर लगाते दिखे, तो कहीं किसी अन्य की चरित्रगत विशेषताओं का महिमामंडन करते। कुछ ने अभी हाल ही में हुए ताजा अनुभवों पर कलम चलाई है, तो कुछ ने दशकों पहले की यादों में प्राण फूँक उन्हें जीवंत कर दिया है।इसी दिशा में मेरे द्वारा किए गए प्रयास ’इंडो-ऑस्ट्रेलियन स्मृतियाँ’ पुस्तक के रूप में फलीभूत होकर आपके समक्ष उपलब्ध हैं।