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गोपाल राय हिन्दी कथा साहित्य के प्रतिष्ठित विश्लेषक और प्रामाणिक इतिहासकार हैं। हिन्दी कहानी के सुदीर्घ इतिहास के प्रत्येक पक्ष पर उन्होंने विस्तार से लिखा है। ’हिन्दी कहानी का इतिहास’ शीर्षक से ये उद्भव से लेकर अब तक की हिन्दी कहानी की रचना-यात्रा को लिपिबद्ध कर रहे हैं। इस पुस्तक के दो खंड प्रकाशित हो चुके हैं। प्रस्तुत पुस्तक इसी महत्त्वपूर्ण योजना का तीसरा खंड है। पहले खंड में 1900-1950 ई. तक की हिन्दी कहानी का इतिहास प्रस्तुत किया गया है। दूसरे खंड में 1951-1975 की हिन्दी कहानी का लेखा-जोखा है। इस तीसरे खंड में 1976 से 2000 के बीच विकसित हिन्दी कहानी का व्यवस्थित इतिहास है। लेखक के अनुसार, ’इस अवधि में जो कहानी-साहित्य रचा गया, उसकी सीमाएँ तो हैं, पर उसका आलेखन और मूल्यांकन कम जरूरी नहीं है। इक्कीसवीं सदी में जो कहानी-साहित्य रचा जा रहा है, उसकी नींव के रूप में इसका विवेचन आवश्यक है।’ पुस्तक की खास विशेषता यह भी है कि कहानी की सक्रियताओं के साथ लेखक ने उन विभिन्न सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक व सांस्कृतिक स्थितियों का भी विश्लेषण किया है। जिनका प्रभाव अनिवार्य रूप से रचनाशीलता पर पड़ता है, तथ्यों की प्रामाणिकता और प्रवृत्तियों के विश्लेषण की क्षमता इसे विशेष रूप से उल्लेखनीय कृति बनाती है। हिन्दी कहानी के विकासेतिहास में रुचि रखने वाले पाठकों, शोधार्थियों व लेखकों के लिए समान रूप से महत्त्वपूर्ण कृति।