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साहित्य यदि समाज का दर्पण है तो गीत हीरे की वह अंगूठी है, जिसमें पूरा युग सूक्ष्म रूप में प्रतिबिंबित होता है। वैदिक मंत्रों में ज्ञान-विज्ञान के गूढ़ अर्थ बीज रूप में समाहित हैं। जैसे आम के बीज में उसके वृक्ष की जड़, शाखा, मंजरी और फल सभी सूक्ष्म रूप में उपस्थित रहते हैं, वैसे ही वैदिक मंत्रों में भी विज्ञान के वितान से लेकर अध्यात्म के रहस्य तक सँजोए हुए हैं। आपके तप, चिन्तन- मनन से उन रहस्यों का साक्षात्कार होता है। उपन्यास की तरह बड़ा कलेवर न होने के कारण गीत विस्तार से अपने समय को आँक नहीं सकता , लेकिन अपने युग की सारी बातों को सलीके से समेट सकता है।जैसे मंत्रों में शब्दार्थ सिकुड़कर बैठते हैं,वैसे ही गीतों में व्यंजना शक्ति-सम्बलित अर्थ वामन रूप में उपस्थित होते हैं। आवश्यकता उनके डिकोड करने की है, जिसके लिए व्याख्याता की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। पिछला एक दशक भारतीय समाज के लिए ऐतिहासिक रहा है जिसमें एक ओर कोरोना की विभीषिका ने नागरिकों को घरबंदी का स्वाद चखा दिया और ऐसी स्थिति उत्पन्न कर दी कि सारे रिश्ते- नाते चकनाचूर हो गए । दूसरी ओर सनातन धर्म के पुनर्जागरण ने हिंदू समाज को जीवित होने का एहसास कराया और स्वतंत्रता को सुसंस्कृत धरातल पर उतरने की ऊर्जा प्रदान की। काशी का विश्वनाथ मंदिर , अयोध्या का राम मंदिर और प्रयागराज का महाकुंभ उस दृष्टि से हमारे जीवन की महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाएं हैं, जिन्हें सदियाँ याद कर गर्वित होंगी। पिछली आधी सदी के युगीन परिवर्तनों ने मेरे गीतों को भी प्रभावित किया है।’उत्तरा फाल्गुनी’ के गीत मेरे प्रारंभिक गीतों से बिल्कुल अलग, कहीं -कहीं ज्यादा नमकीन भी लगेंगे। यह स्वाभाविक भी है क्योंकि समय के अनुसार अनुभव बदलते हैं और कविता की संरचना में अनुभव की विशेष भूमिका होती है। कविता