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स्वतंत्रता की चेतना मनुष्य में हमेशा मौजूद रहेगी। न वह कभी मरी है न मरेगी। स्वतंत्रता प्राप्त करने के ढंग भले ही भिन्न हों, चाहे वह सशस्त्र क्रांति द्वारा हो या महात्मा गांधी द्वारा अपनाए गए असहयोग आंदोलन द्वारा, वह हमेशा जीवित रहेगी। भारत का स्वाधीनता संग्राम मनुष्य की इस स्वतंत्र चेतना का जीता-जागता सबूत है। इस पुस्तक में प्रस्तुत है 1857 के प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर 1947 तक की स्वाधीनता और बंटवारे के तूफान की रोमांचक गाथा।