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हिंदी गद्य के कथित सौन्दर्यवाद और प्रकारांतरवाद से सर्वाधिक हानि पाठकीयता की हुई है। भाषा की इस आत्मरति ने पाठकीय क्षुधा, मनुष्य के सरोकारों और समाज की अपेक्षाओं को हाशिए पर ला खड़ा किया है। ऐसे में इस तरह के लेखन को स्वान्तःसुखाय कहना भी कदाचित उपयुक्त नहीं होगा। अलबत्ता आत्ममुग्धता की श्रेणी में यह लेखन अवश्य रखा जाएगा। कथालेखन के इस आसन्न संकट को जो गिनेचुने नाम आज चुनौती दे रहे हैं उनमें एक प्रमुख नाम गीताश्री का भी है। उनकी कहानियों में भाषा का छलावापूर्ण वैभव भले नहीं दिखता हो लेकिन कथानक की विश्वसनीयता और अपने जैसे प्रतीत होते पात्रों के लम्स को सहज महसूस किया जा सकता है।