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'फेरे ना सही, एक परिक्रमा तो की है साथ तुम्हारे । क्या इस परिक्रमा को देवताओं ने आशीर्वाद नहीं दिया होगा? हे देव ! क्या हम बंध नहीं गये होंगे एक आत्मिक बंधन में?' हिन्दी की कक्षा में मिले अवि और निशि ने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि उनकी भी कोई प्रेम कहानी होगी। नैनीताल और भीमताल जैसे छोटे शहरों में बसने वाले मध्यम वर्गीय लोग सोच भी कहाँ पाते है कि उनकी प्रेम कहानी ईश्वर ’सिटी ब्यूटीफुल’ में रचेंगे। किंतु अकल्पनीय होता है - अवि और निशि की प्रेम कहानी रची जाती है । अवि फिर कभी साधारण मनुष्य नहीं रहता, फिर वो निशि का देव हो जाता है। निशि जो महादेव की उपासक हैं, उन्हीं की छवी अवि में देखती है। 'लोग जीवनभर भटकते हैं ईश्वर की खोज में, फिर भी उन्हें ईश्वर दिखाई नहीं देते और यहाँ सेक्टर सतारा में देव स्वयं मुझे जूस पिला रहे थे, मेरे साथ फल खा रहे थे...कैसी विचित्र बात थी !! अद्भुत !!!' किंतु परिस्थियों में परिवर्तन, मन के बदलते भावों और हृदय में होती उथल पुथल के चलते, एक खिंचाव सा आ जाता है दोनों के रिश्ते में। अवि निशि से बात करना बंद कर देता है और निशि ख़ुद को ठगा सा महसूस करती है। वो जो अवि को अपना सबकुछ मान चुकी होती है, जिसने उसकी पदधूलि से अपनी माँग भरी होती है, अब कई प्रश्नों से स्वयं को घिरा हुआ पाती है। उसकी पीड़ा बढ़ती जाती है- 'महिलाओं के साथ भेदभाव साहित्य में भी हुआ है ।सबको देखो देवदास की पीड़ा दिखती है । किसी निशि की पीड़ा क्या कभी उसके रिकॉर्ड को तोड़ पाएगी? क्या कोई कभी किसी विरह में सुलगते मन को कहेगा कि 'ऐ! क्या हुआ? क्यों निशि बनी फिर रही हो?' स्त्री-पुरुष के संबंधों की कोमलता और इन्हीं संबंधों की जटिलता की परतों को खोलती यह किताब, पता नहीं कितने उत्तर आपको देगी पर कई प्रश्नों की कील आपके हृदय में ज़रूर गाड़ देगी।