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वो जिसके नाम से लज्ज़त बहुत हैउसी के ज़िक्र से बरकार बहुत हैअभी सूरज ने लैब खोले नहीं हैंअभी से धुप में शिद्दत बहुत हैमुझे सोने की क़ीमत मत बताओमें मिट्टी हूँ मेरी अज़मत बहुत हैकिसी की याद में खोये रहेंगेगुनहगारों को ये जन्नत बहुत हैउन्हें मसरूफ़ रहने का मरज़ थाउन्हें भी आजकल फ़ुरसत बहुत हैकभी तो हुस्न का सदक़ा निकालोतुम्हारे पास ये दौलत बहुत हैग़ज़ल खुद कहके पढ़ना चाहते होमियाँ इस काम में मेहनत बहुत हैडॉ| अंजुम बाराबंकवी बुनियादी तौर पर ग़ज़ल के शायर हैं I उनकी ग़ज़लों मैं सागर को गागर मैं सामने का फ़न है और सूफ़ियत भी| वे इतिहास और वर्तमान को तुलनात्मक दृष्टि से देखते हैं, साथ ही वे परिवर्तन के पक्षधर भी हैं, और यथास्थिति के विरुद्ध आक्रोश उनकी लिखावट मैं स्पष्ट महसूस किया जा सकता है|अंजुम यथार्त की भावभूमि पर खड़ा हुआ कल्पनाओं के तार बुनने वाला बाँका शायर है| उनकी अवलोकन और निरीक्षण की क्षमता अदभुत है| इनकी रचनाओं में अवध की तहज़ीबों की झलक भी मिलती है और ज़िन्दगी के सभी रंगों का रास भी|