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अभिमन्यु खण्ड-काव्य में महाभारत कालीन अर्जुन एवं सुभद्रा के पुत्र के रूप में प्रसिद्ध पौराणिक ऐतिहासिक महानायक अभिमन्यु के जीवन-चरित्र की चर्चा के साथ -साथ उन विषय-वस्तुओं को भी केंद्र में रखा गया है ,जिसके कारण महाभारत का युद्ध हुआ। इस खंड-काव्य में उन विषयवस्तुओं पर प्रकाश डाला गया है जिन्हें अभी तक अतीत के अतल गहराइयों से बहार आने का अवसर प्राप्त नहीं हुआ है। या जिनपर अपेक्षाकृत बहुत कम या न के बराबर प्रकाश डाला गया है। कुरुक्षेत्र के युद्ध में जिस प्रकार से तमाम कुरु-योद्धा एक निहत्थे बालक पर टूट पड़े तथा जिस राजसिंहासन के लिए इस प्रकार की भीषण त्रासदी हुई थी उन सभी बिंदुओं को इसमें उकेरने का प्रयास किया गया है। यह एक प्रतीकात्मक खंड काव्य भी है जिसमें नवयुगीन वर्ग चेतना ,शोषण, उत्पीड़न, संत्रास, सत्ता के लिए सियारी तिकड़म, भय, भूख , बेरोजगारी तथा भ्रष्टाचार से युद्धरत आम आदमी का प्रतीक बनकर उभरा है आज का अभिमन्यु। इस खंडकाव्य में लेखक एक और जहां गांधीवादी दर्शन तथा सत्याग्रह का मूलचेतना पिरोकर भयानक नरसंहार वाली युद्ध-कालीमा से मानवता तथा इस धरती को बचाकर मानवीय संवेदना और सरोकार को जीवित रखते हुए प्राणी मात्र का कल्याण चाहते हैं ,तो दूसरी ओर भ्रष्ट, बेईमान और पुत्रमोह में अंधे अभिमानी सत्ता के विरुद्ध पूरी शक्ति के साथ अपना सर्वश्रेष आत्मसर्ग का भी परिचय दिया है।