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भारतीय संस्कृति पर प्रत्यक्ष रूप से विभिन्न युगों की सांस्कृतिक प्रवृतियों की छाप पड़ी है प्रत्येक युग में संगीत की विभिन्न प्रवृत्तियों और भूमिकाओं का भारतीय संस्कृति पर अलग-अलग प्रभाव पड़ा है। संगीत के किस रूप के किस युग में क्या भूमिकाएं रही है और समाज व संस्कृति के लिए उसकी क्या उपियोगिता और प्रासंगिकता रही यह संगीत के लिए एक चुनौती बना रहा। इन सभी बातों पर विचार करते हुए संगीत को सदैव समाज और संस्कृति में आए बदलावों और रूझानों के अनुरूप ही समाज के समक्ष रखने का प्रयास किया और उसकी भूमिका को अग्रणी स्थान दिया। संगीत के संदर्भ में वस्तुत: वही अनुसंधानात्मक दृष्टि उसे हर बदलते युग में प्रासंगिक बनाती रही।