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स्वीकृति, संयम और सहजता - जब विचार इन तीनों से अलंकृत होते हैं, तभी कविता जन्म लेती है।’अनकही’ मेरे अंतर्मन की वही ध्वनि है, जो शायद हर युवा के भीतर गूंजती किसी अनकही कहानी से जुड़ती है।इस संकलन की हर कविता एक संवाद है - कभी प्रश्न करती हुई, तो कभी उत्तर देती हुई।यह केवल पंक्तियाँ नहीं, बल्कि आत्म-खोज की ओर एक विनम्र निमंत्रण हैं।जैसे हमारे विचारों का क्रम निश्चित नहीं होता,वैसे ही इस संग्रह में भी कविताओं का कोई निश्चित क्रम नहीं है।हर कविता को उसी स्वतः प्रवाह में पढ़ें, जिस भाव में वह आपके सामने आए।मेरा पाठकों से आग्रह है:इन कविताओं को सिर्फ पढ़ें नहीं - इनके साथ बैठें, ठहरें, महसूस करें...और शायद, इनमें अपनी ’अनकही’ को ढूँढ पाएँ।