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सहर्ष मैं ’शून्य से शून्य तक’ कविता संग्रह को आपके समक्ष पेश करने का प्रयास कर रही हूँ जो इन्सान की ज़िन्दगी के सफ़र का वृतांत है ।इंसान को समय समय पर एहसास कराती है कि शून्य की भूमिका अन्दरूनी व बाह्य है । शून्य आरम्भ ही नहीं अंत भी है ...शून्य नगण्य है तो शून्य पूर्ण इकाई भी है ... इस पुस्तक में कविताएँ शून्यता के अनेक रंगों की तस्वीर तैयार करती हैं । कविताएँ शून्य के अनेक पहलुओं पर हमारा ध्यान धराती हैं जैसे हमारी उत्पत्ति अज्ञात है और जीवन की दौड़ का परिणाम शून्य ही है .. गम और ख़ुशी, हार व जीत, प्रेम और नफ़रत सब में शामिल है शून्यता...धरती पर आने के बाद हम नाम, रूप, रिश्ते, पहचान और महत्वाकांक्षाओं में उलझे रह जाते हैं।