Librería Samer Atenea
Kálamo Books
Librería Elías (Asturias)
Librería Kolima (Madrid)
Librería Proteo (Málaga)
गीता को प्रायः धर्म, अध्यात्म, नैतिकता, योग या आत्मबोध के ग्रंथ के रूप में पढ़ा जाता है। लेकिन क्या इसके भीतर एक और संरचना भी छिपी है-ऐसी संरचना जो यह बताती है कि जब जानकारी अधूरी हो, परिणाम अनिश्चित हों और प्रत्येक विकल्प के साथ कोई न कोई कीमत जुड़ी हो, तब मनुष्य कैसे निर्णय ले?गीता: अ गवर्नन्स मॉडल ऑफ रियलिटी इसी प्रश्न से प्रारंभ होती है।इस पुस्तक में कुरुक्षेत्र केवल युद्धभूमि नहीं है। वह उस स्थिति का रूपक है जिसमें बुद्धिमान व्यक्ति को तब भी कार्य करना पड़ता है जब पूर्ण स्पष्टता उपलब्ध नहीं होती। अर्जुन का संकट जानकारी की कमी नहीं, बल्कि बढ़ती जागरूकता और घटती कार्य-क्षमता के बीच असंतुलन है। कृष्ण का उत्तर केवल सांत्वना नहीं देता; वह धीरे-धीरे एक ऐसी व्यवस्था स्थापित करता है जिसमें निर्णय, कर्म और उत्तरदायित्व फिर से संभव हो सकें। Gita02Hinपुस्तक धर्म को कठोर नियम के रूप में नहीं, बल्कि दबाव में भूमिका और उत्तरदायित्व के संरेखण के रूप में देखती है। कर्म को केवल फल या दंड की व्यवस्था नहीं, बल्कि साझा वास्तविकता में भागीदारी के रूप में समझती है। अनासक्ति को उदासीनता नहीं, बल्कि परिणाम पर मनोवैज्ञानिक स्वामित्व छोड़ने की क्षमता के रूप में प्रस्तुत करती है। ज्ञान, ध्यान, त्याग, गुण, आस्था और समर्पण को भी अलग-अलग आध्यात्मिक आदर्शों के बजाय शासन की एक समेकित संरचना के हिस्सों के रूप में पढ़ा गया है।इस दृष्टि में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं है कि सही उत्तर क्या है, बल्कि यह है कि जब कोई अंतिम उत्तर उपलब्ध न हो, तब भी व्यक्ति अपने भीतर विखंडित हुए बिना कैसे कार्य करे?पुस्तक का केंद्रीय दावा सरल है: जिम्मेदार कर्म के लिए पूर्ण निश्चितता आवश्यक नहीं है। भूमिका की स्पष्टता, मन की स्थिरता,