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कभी कभी हम यह सोचने लग जाते हैं कि हनुमान जी भला कैसे छलाँग लगाकर लंका गये होंगे ! यह भी कभी संभव हो सकता है ! उससे भी ज़्यादा अचरज में डालने वाला विषय है दशानन - याने की दस सिर वाला इंसान ! ऐसा तो हो ही नहीं सकता ! वस्तुतः लंका नरेश की बुद्धि और कुशलता का बखान करते समय ऐसा रूपक सामने आया | महाकाव्य में कवि ऐसे रूपक का इस्तेमाल करते आए हैं | यह तो हमारी मजबूरी है कि हम विषयों को समझना चाहते ही नहीं |भेद बुद्धि की गुलामी करनेवालों को मौके मिल ही जाते हैं | संतों की वाणी में खोट निकालते निकालते सोने का सिक्का भी मिट्टी जैसा बन जाता है | उमा का शरीर लेकर महादेव इतने इतने जगहों पर कैसे गये होंगे ! वो तो रहने ही दें, विष्णु अपने चक्र के सहारे सती के पार्थिव शरीर को टुकड़ों में कैसे बाँटा होगा ! इस प्रकार की द्विविधा भी हमारे मन में धर्म और विज्ञान के द्वंद के कारण ही उत्पन्न होता है |