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’कुछ सोचा कुछ कहा’ वस्तुतः कुछ विचारो की अभिव्यक्ति हैं, जो चलते फिरते , उठते बैठते एक आम महानगरीय जीवन में किसी भी व्यक्ति के दिलो दिमाग में आते जाते रहते हैं / कोई विशेष साहित्यिक विधा से इतर ये कवितायेँ सिर्फ दिलो दिमाग में आते जाते खयालो का एक लेखा जोखा हैं / इनके विचार और विधा सबकुछ अनियोजित और अविरल हैं, फिर भी संभवतः पढ़ने वालो के ये कविताये मौलिक विचारो की एक ताज़गी भरी सुगंध दे सकेंगे / इसी आशा के साथ - प्रस्तुत हैं - ’कुछ सोचा कुछ कहा’