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'क्या वाकई हम कभी बिछड़े थे? या हम बस एक-दूसरे के भीतर और गहरे धँस गए थे?' ’तुम, आ गए?’ कोई साधारण प्रेम कहानी नहीं है। यह उस दबे हुए शून्य की परछाईं है जो प्रायः हमारी सफलताओं और उत्तरदायित्वों के पीछे छिपा रहता है। यह कथा है एक ऐसे व्यक्ति की, जो संसार की दृष्टि में ’सफल’ था, ’समझदार’ था और ’स्थिर’ भी, किंतु उसने स्वयं के प्रति ’ईमानदारी’ कहीं खो दी थी। उसके उस सुदृढ़ कवच के भीतर एक ऐसा रिक्तपन था, जिसे उसने वर्षों से कोई नाम नहीं दिया था। हम प्रायः दूसरों के लिए ’उचित’ बनते-बनते स्वयं के लिए ’अपरिचित’ हो जाते हैं।यह उपन्यास किसी बड़ी घटना अथवा रोमांच की कथा नहीं है, बल्कि उस मौन की है जो हमारे भीतर सीलन की भाँति जमता रहता है। यह उस मोड़ का वृत्तांत है जहाँ जीवन में कोई आता है लेकिन कुछ बदलने या सुधारने के लिए नहीं, बस साथ बैठने के लिए। जैसे प्रचंड सूर्यताप में अकस्मात कोई शीतल छाया मिल जाए। ’तुम, आ गए?’ उन लोगों के लिए है जो अपने होने का अर्थ उन गलियों और स्मृतियों में ढूँढ रहे हैं, जहाँ से उन्हें बहुत पहले आगे धकेल दिया गया था। क्या वास्तव में समय घाव भर देता है, अथवा केवल उन पर स्मृतियों की एक सूक्ष्म परत चढ़ा देता है?किंतु सत्य की प्रकृति ऐसी है कि वह अधिक समय तक दबा नहीं रहता; वह बस किसी ऐसी आहट की प्रतीक्षा में ठहर जाता है, जो उसे उसकी वास्तविकता का बोध करा सके। जब एक अपरिचित उपस्थिति उसके वर्षों पुराने कवच को भंग करती है, तब उसे आभास होता है कि प्रेम कोई उद्धार या समाधान नहीं, बल्कि एक ऐसी अवस्था है जहाँ मनुष्य कुछ क्षणों के लिए बिना किसी मुखौटे के रह पाता है। क्या वह इस नए, नग्न सच के साथ जी पाएगा? सम्राट सिंह का यह उपन्यास आपके भीतर की उन दरारों को छू लेगा जिन्हें आपने सदैव छिपा कर रखा है ।