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’एक आंख वाला शासन’ में सत्य घटनाएं हैं। खराब शासनिक-प्रशासनिक व्यवस्था पर दो भाइयों की चर्चा है। कुछ और पात्र भी हैं। किस तरह से आम आदमी पुलिस के पास न्याय की उम्मीद लेकर जाता है, लेकिन पुलिस वाले केस दर्ज नहीं करते। खानापूर्ति के लिए रोजनामचे में हल्की रिपोर्ट लिखी जाती है। जांच में भी गंभीरता नहीं दिखाई जाती। हमले की जांच जमीनी विवाद से जोड़ दी जाती है। फिर एसडीएम के पास सुनवाई को केस भेजा जाता है। एसडीएम भी मामले की तह तक नहीं जाते। दूसरे मामले में पीड़ित पक्ष पर ही केस दर्ज कर दिया जाता है। कई महीने परेशान करने के बाद केस रद करना पड़ता है। तीसरे मामले में एक शातिर व्यक्ति झूठी शिकायत करता है। पुलिस मौके पर जाकर जांच नहीं करती। पंचायत से भी फीडबैक नहीं लिया जाता। थाने से ही सही व्यक्ति के खिलाफ रिपोर्ट तैयार कर एसडीएम कोर्ट भेज देती है। शासन-प्रशासन आम आदमी के दूर दिखता है। सत्ता कुछ लोगों तक सीमित होकर रह गई है। बेरोजगारों की किसी को चिंता नहीं। रोजगार की तलाश में उम्र बीती जा रही है। शादियां देर से हो रही हैं या हो ही नहीं रही हैं। इसका सामाजिक ताने-बाने पर प्रभाव पड़ रहा है। सरकारों की ऊर्जा कर्मचारियों व पेंशनर्स को खुश करने पर खर्च हो रही है, वे फिर भी खुश नहीं हैं। ये वर्ग कभी खुश हुए हैं भला। अनियोजित विकास पर चिंता जताई गई है। विकास के अभाव में खाली हो रहे पिछड़े गांवों की स्थिति रखी गई है।