LIBROS DEL AUTOR: hitesh kumar garg

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hitesh kumar garg Eliminar filtro Quitar filtros
  • तनु ( Tanu )
    Hitesh Kumar Garg
    जीवन की गहन व्यथा की ओर संकेत करते हुए मस्तिष्क न जाने किस ओर बढ़ने का प्रयास करता है। जहाँ तक दृष्टि जाती है वहाँ तक अंधकार के सिवाय कुछ दिखाई नहीं पड़ता। व्यष्टि से लेकर समष्टि तक सब अंधकारमय प्रतीत होता है। किस राह पर बढ़े, पाँव कंपकंपाते है। शरीर में सिहरन-सी दौड़ पड़ती हैं। नसों में रक्त इस प्रकार शीतल पड़ जाता है मानों शरीर में रक्त नहीं अपितु बर्फ दौड रही हो। बुध्दि इस प...
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